Tuesday, February 21, 2012

वडर्सवर्थ का काव्य-भाषा-सिद्धांत


परिचयः विलियम वर्ड्सवर्थ  (1770-1850), मूलतः कवि, उनमें एक सहज सौंदर्यबोध और अबाधिक भाव-प्रवणता थी। परिस्थितिवश काव्यालोचन के क्षेत्र में प्रवेश। 1790 में फ्रांस, इटली और आल्पस पर्वत की पैदल यात्रा। आल्पस की प्राकृतिक सुषमा से उनकी सौंदर्य भावना प्रभावित। फ्रांस की राज्य क्रांति के परिणामों से इनकी आलोचना प्रभावित है।
काव्य- भाषा- सिद्धांत:
          18वी शताब्दी के अंत में कवियों की शैली रूढ़ और निरूपयोगी हो गई थी।
वर्ड्सवर्थ ने तो परंपरागत भाषा-शैली का और भी तीव्र विरोध किया। आधुनिक
युग में जिस प्रकार टी.एस.इलियट और एजरा पाडंड ने बोलचाल की भाषा के
प्रयोग का समर्थन किया, वैसे वर्ड्सवर्थ ने अपनी प्राकृतिक और स्वाभाविक भाषा
शैली का समर्थन किया। वर्ड्सवर्थ काव्यगत युक्तियों, मानवीकरण, वक्रोक्ति
तथा पौराणिक दंत कथाओं, भावाभास आदि को काव्य के लिए उपयुक्त नहीं
मानते।
          18वीं शती में नव-अभिजात्यवादी युग में भाषा के निम्न और उच्च दो रूप
प्रचलित थे। दैनिक जीवन की भाषा को निम्न कहा जाता था, दूसरी उच्च भाषा
जो कृत्रिम, बोझिल और आडंबरपूर्ण हो गई थी वर्ड्सवर्थ ने इसक त्याग किया।
          स्वछंदतावादी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ के काव्य रचना संबंधी विचार विशेष रूप
से इनके प्रिफेस टु लिरिकल बैलेउ्स में प्राप्त होते हैं। नए और मौलिक तथा
पूर्ववर्ती विचारों से अलग विचार।
          अच्छी कविता जोरदार भावनाओं की सहज और स्वतः स्फूर्त उद्गार होती है।
          कविता के लिए विषय भी महत्त्वपूर्ण।
          काव्य में जनसामान्य में प्रचलित भाषा के प्रयोग पर बल।
          अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हो पर यांत्रिक ढंग पर उनकी भरमार नहीं।
          कवि की दृष्टि में मानव और प्रकृति तत्त्वतः एक दूसरे के लिए ही हैं और
मानव मन, प्रकृति के सुंदर और रोचक गुणों का दर्पण है। इसी प्रकार कविता
ज्ञान का सूक्ष्म तत्त्व और उसका प्राण-वायु है। ज्ञान का आरंभ और अंत
कविता ही है। इस प्रकार वर्ड्सवर्थ के काव्य संबंधी विचार भावुकतापूर्ण होते
हुए भी व्यावहारिक और तत्त्वपूर्ण हैं।
          अन्य काव्य तत्त्वों की भांति ही भाषा के विषय में भी वर्ड्सवर्थ कृत्रिमता एवं
जटिलता की अपेक्षा भाषा के सारल्य तथा स्वाभाविकता से ओत-प्रोत रूप का
ही समर्थन किया। यही कारण है कि उन्होंने गद्य भाषा का भी पक्षपात किया है।
          वर्ड्सवर्थ भाषा में सरलता के पक्षपाती तो हैं किंतु उनका यह मत बिल्कुल नहीं
कि काव्य भाषा ग्राम्यत्व दोष से दूषित किंवा अटपटी हो।
          वर्ड्सवर्थ ने स्पष्ट किया कि जो कवि जनसामान्य के लिए काव्य सर्जन में प्रवर्त्त होता है, उसे कभी भी कृत्रिम एवं कल्पित भाषा की छूट नहीं दी जा सकती। वे यह भी मानते हैं कि यद्यपि कवि विशुद्ध रूप से जन भाषा में कविता नहीं कर सकता, फिर भी उसे काव्य भाषा का चयन जनभाषा से करके ही सदा उससे नैकट्य संबंध स्थापित रखना चाहिए। चुनाव करते समय काव्य के लिए आवश्यक परिमार्जन एंव परिवर्तन का अधिकार तो उसे रहता ही है।
          वर्ड्सवर्थ का मानना है कि ग्रामीण अपनी निम्न स्थिति के कारण सामाजिक गर्व से मुक्त होकर सरल स्वाभाविक अभिव्यक्ति करते हैं। उनकी वाणी में सच्चाई तथा भावों में सरलता होती है।
          गद्य-पद्य में या गद्य और छन्दोबद्ध रचाना में कोई तात्विक भेद नहीं हो सकता। वर्ड्सवर्थ की भाषा संबंधी इस अतिवादी मान्यता का परंपरा तथा वास्तविकता के साथ स्पष्ट विरोध है। गद्य-पद्य का अंतर केवल छंद के कारण नहीं होता, अपितु वाक्य विन्यास, पद चयन आदि के कारण होता है।
          वर्ड्सवर्थ का मानना है कि प्राचीन कवियों ने वास्तविक घटनाओं से उद्बुद्ध भावों का आधार लेकर काव्य रचना की। चूंकि उनकी अनुभूति और भाव प्रबल थे, इसलिए सहज ही उनकी भाषा प्रभावी और अलंकृत हो गई। बाद के कवि यश की कामना से काव्य रचना करने लगे, जिससे भाषा में कत्रिमता गई। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथ में जाकर भाषा जटिल,कत्रिम और वागडिम्बयुक्त हो गई। ऐसी भाषा को वर्ड्सवर्थ ने त्याज्य बताया।

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