Tuesday, February 21, 2012

अरस्तू का विरेचन सिद्धांत


          अरस्तू द्वारा प्रतिपादित विरेचन सिद्धांत भी अनुकरण सिद्धांत की भांति प्लेटो द्वारा काव्य पर किए गए आक्षेप का प्रतिवाद रूप है। अरस्तू ने विरेचन सिद्धांत के द्वारा काव्य के उद्देश्य एवं प्रभाव की समुचित प्रतिष्ठा करते हुए त्रासदी अर्थात करूणा भाव की उद्बुद्धि के आस्वाद रूप की समीचीन व्याख्या प्रस्तुत की। अरस्तू के अनुसार त्रासदी के मूलभाव भावों को उद्बुद्ध कर विरेचन पद्धति के द्वारा मानव मन का परिष्कार करते हैं, जैसे विरेचन से शरीर-शुद्धि होती है।
          विरेचन का अर्थ है, विचारों का निष्कासन या शुद्धि। मूलतः चिकित्साशास्त्र के इस शब्द का साहित्य पर लागू करने का श्रेय अरस्तू को ही जाता है। प्लेटो ने कला और काव्य पर यह आक्षेप लगाया था कि इनसे हमारी दूषित वासनाएं एवं मनोवृत्तियां उत्तेजित एवं पुष्ट होती हैं- संभवतः इसी का खंडन करने के लिए अरस्तू ने प्रतिपादित कियाकि कला और साहित्य के द्वारा हमारे दूषित मनोविकारों का उचित रूप में विरेचन हो जाता है। अतः वे समाज के लिए हानिकारक नहीं है।
          त्रासदी के प्रसंग में अरस्तू ने लिखा कि करूणा और भय हमारे मन में एकत्र होते रहते हैं तो वे हानिकारक होत हैं। त्रासदी में कृत्रिम रूप से हमारी करूणा और भय की भावनाओं को निकास का अवसर मिल जाता है। करूणा तथा त्रास के उद्रेक के द्वारा इन मनोविकारों का उचित विरेचन हो जाता है। भय और करूणा के उत्तेजन और उसके बाद उसवके शमन से एक प्रकार की मानसिक शांति प्राप्त होती है, जो सुखद होती है। इस सुखद अनुभूति को कलाजन्य-आस्वाद भी माना जा सकता हैं
          अरस्तू के परवर्ती विद्वानों ने तीन प्रकार से विरेचन की व्याख्या की-
1.            धर्मपरक            2. नीतिपरक                  3. कलापरक                   4. मानसिक
धर्मपरक - धर्मपरक विरेचन का अर्थ है वाह्य विचारों की उत्तेजना और उनके शमन के द्वारा आत्मा की शुद्धि और शांति।
नीतिपरक- नीतिपरक का अर्थ है मनोविकारों की उत्तेजना द्वारा विभिन्न अंतर्वृत्तियों का समन्वय या मन की शांति और परिष्कृति होना।
कलापरक- कलापरक व्याख्या के संबंध में विभिन्न विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ विद्वानों के विचार से कलाजन्य आनंद भी विरेचना की परिधि में आता है तो कुछ इसे अस्वीकार भी करते हैं। उनके विचार से विरेचन केवल अभावात्मक क्रिया है। आनंद का भाव उसकी सीमा से बाहर है, किंतु प्रो. बूचर ने इस प्रकार के तर्कों का खंडन करते हुए बताया है कि विरेचन के दो पक्ष हैं - एक अभावात्मक और दूसरा भावात्मक।
मनोवेगों के उत्तेजन ओर तत्पश्चात उनके शमन से उत्पन्न मनःस्थिति उसक अभावात्मक पक्ष है, इसके उपरान्त कलात्मक परितोष (आनंद) उसका भावात्मक पक्ष है। भावात्मक के अनुसार मन की शांति को आनंदोपलब्धि कहा जा सकता है। अभावात्मक सिद्धांत के अनुसार दुखों का अभाव ही मन को शांति प्रदान कर सकता है। डॉ. नगेन्द्र ने केवल अभावात्मक पक्ष को ही स्वीकार किया है।
          डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त के अनुसार - विरेचन एक अपूर्ण सिद्धांत है जो केवल दुखान्त रचनाओं (ट्रेजडी) पर ही लागू होता है, किंतु अरस्तू के व्याख्याता इसे परिपूर्ण सिद्धांत के रूप में ग्रहण करके व्याख्या करने का प्रयास करते हैं। काव्य और कलाओं द्वारा हमारी सभी प्रकार की भावनाओं की उद्दीप्ति और अभिव्यक्ति होती है, जबकि विरेचन द्वारा संबंध केवल विकृत या अशुद्ध भावनाआंे से ही है। अशुद्ध एवं कलुषित भावनाओं के रेचन से आनंद प्राप्त करने की बात मानी जा सकती है, किंतु पवित्र एवं शुद्ध भावों के रेचन के संबंध में क्या कहा जाएगा ? अवश्य ही इस प्रसंग में इस प्रसंग में विरेचन की बात नहीं कही जा सकती। अस्तु इस एकांगी सिद्धांत को सर्वांगीण रूप देना उचित प्रतीत नहीं होता।
          विरेचन सिद्धांत की तुलना भारतीय आचार्य अभिनवगुप्त के अभिव्यक्तिवाद से की जा सकती है, क्योंकि दोनों ही आचार्य काव्यानंद या रसास्वादन के मूल में वासनाओं के रेचन या उनकी अभिव्यक्ति की बात स्वीकार करते हैं।
          एफ.एल.लूकस ने विरेचन के सिद्धांत का विरोध किया है और माना है कि हम नाटक देखने इसलिए नहीं जाते कि मनोवेगों के निकाल दें, अपितु इसलिए जाते हैं कि उनको अधिक मात्रा में प्राप्त करें। भारतीय आलोचकों ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि दुखांत नाटक आनंददायक क्यों होते हैं।

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